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सिंचाई का इतिहास व प्रदेश की मुख्य नहर प्रणालियों का सिंहावलोकन 1.0 भूमिका: 1.01 जल प्रकृति की बहुमूल्य देन है जल के बिना जीवन तथा सभ्यता के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने अपना पहला बसेरा वहीं बनाया जहॉं जल आसानी से उपलब्ध था। प्राचीन काल से ही सभ्यता का विकास जल से जुडा है। मानव बस्तियों की स्थापना किसी न किसी जल स्रोत के निकट ही हुई। 1.02 सभ्यता के सुप्रभात से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। आज भी लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या की जाविका कृषि पर आधरित है। कृषि के लिए सिंचाई एक परमावश्यक निवेश है। सिंचाई के लिऐ जल का मुख्य स्रोत वर्षापात है। हमारे देश में वर्षापात के वितरण में क्षेत्रवार और समयवार भारी असमानता है। जहॉं एक ओर पश्चिमी राजस्थान में औसत वर्षा 100 मि0मी0 है वही दूसरी ओर पशिमी मेघालय के चेरापूजी में 11,000 मि0मि0 सामान्य वर्षा होती है। कतिपय वर्षो में बहुत कम वर्षा होने के कारण सूखे की स्थिति भी उत्पन्न होती रही है। वैदिक काल में यह धारणा थी कि धरती की प्यास बुझाने के लिए देवराज इन्द्र प्रत्येक वर्ष बादल भेजते है। किसी वर्ष विशेष में वर्षा न होने की स्थिति को देवराज इन्द्र का अप्रसन्न होना माना जाता था। यह भी उल्लेख मिलता है कि इन यज्ञों के आयोजन के फलस्वरूप बादल उत्पन्न होते थे तथा वर्षा होती थी। 1.03 उत्तरी भारत में गंगा का मैदानी भाग कृषि के लिए सर्वथा उपयुक्त माना जाता है, लेकिन इस क्षेत्र में वर्षा के न होने की स्थिति में अकाल पड़ने का लम्बा इतिहास रहा है। सबसे पहले पड़े अकाल का उल्लेख वायु पुराण में किया गया है। 3000 वर्ष ईसा पूर्व महाराजा मान्धाता के समय पड़े एक गम्भीर अकाल का उल्लेख महाभारत में है। पुराने ग्रन्थों में महाराजा दशरथ के समय अकाल का भी उल्लेख है। अभी हाल में वर्ष 1770 ई0 में निचले बंगाल एवं बिहार में अत्यन्त भयानक सूखा पडा, जिसके कारण लगभग एक तिहाई जनसंखया का विनाश हो गया। वर्ष 1837 में उत्तरी भारत में शताब्दी का पहला भयानक सूखा पडा जिसके कारण लगभग एक तिहाई जनसंख्या का विनाश हो गया। वर्ष 1837 में उत्तरी भारत में शताब्दी का पहला भयानक सूखा पडा जिसने ब्रिटिस सरकार का ध्यान इस और आकर्षित किया कि प्रदेश की सदा नीरा नहरें निकालकर कृषि को सूखे की स्थिति से बचाया जाय। 2.0 वैदिक युगीन सिंचाई प्रबन्ध: 2.01 वेदों में जल एवं संसाधनों यथा कुओं, नहरों एवं बॉंधों का उल्लेख अनेक स्थनों पर मिलता है। कूप (कुऑं), कवट (खोदकर बनाये गये गढढे) का उल्लेख ऋगवेद के कई स्थलों पर है। कुओं का जल कभी कम नहीं होता था। कुओं से पानी, पत्थर के बने चक्के (अश्मचक्र) से निकाला जाता था, जिसमें रस्सियों के सहारे जल भरने वाले कोष बँधे रहते थे। ऋगवेद में यह भी उल्लेख है कि कुऑं से पानी निकालने के बाद जल को लकड़ी के बने पात्र (अहाव) में उड़ेला जाता था। कूपों का उपयोग मनुष्यों तथा पशुओं के निमित्त जल निकालने के लिए ही नहीं किया जाता था, वरन् कभी-कभी इनसे सिंचाई भी की जाती थी, जो उनको उपजाऊ बनाता था।
2.02 ऋगवेद में शब्द अवता का भी उल्लेख है जो कि कुएं का प्रतीक है एक अन्य रिचा में कुल्या शब्द भी आया है, जिसका तात्पर्य कृत्रिम नहर से है। यजुर्वेद में नहरों के खोदने के प्रसंग आये है, इनमें नदियों को गाय तथा नहरों को बछड़ा कहा गया है। पौराणिक काल में भागीरथ द्वारा गंगा को पृथ्वी पर लाये जाने की कथा है, वह और कुछ नहीं अपुति बहते हुए जल से सिंचाई की सफल व्यवस्था का इतिहास है। देवताओं के गुरु बृहस्पति ने भी कहा है कि बॉंधों एवं नहरों की मरम्मत पवित्र कार्य है। उनका उत्तरदायित्व राज्य के धनी लोगों का होना चाहिए। इससे स्पष्ट होता है कि भारत में प्राचीन काल से ही सिंचाई संसाधनों का उपयोग हो रहा है तथा इनका काफी महत्व रहा है। 3.01 महाभारत 3150 वर्ष ईसा पूर्व महाभारत काल में खेती की सिंचाई करने का उल्लेख अनेक ग्रन्थों में मिलता है इस संदर्भ में जब ऋषिराज नारद राजा युद्धिष्ठर से मिलने उनके राज्य में आते है और उनसे पूछते है कि क्या आपके राज्य में किसान हृष्टपुष्ट एवं समृद्धशाली है? क्या जलाशय बृहद और पर्याप्त है तथा पानी से पूरी तरह हुए है एवं राज्य के विभिन्न भागों में पानी का वितरण हो रहा है? यह इस तथ्य का परिचायक है कि महाभारत काल में भी सिंचाई व्यवस्था की ओर पर्याप्त ध्यान दिया जाता था। 4.0 प्राचीन काल में सिंचाई प्रबन्ध:
4.01 प्राचीन काल के हिन्दुशास्त्रों में भी सिंचाई एवं सिंचाई व्यवस्था के निर्माण में गहरी रूची होने की झलक मिलती है। 300 वर्ष ईसा पूर्व चन्द्रगुप्त मौर्य की सभा सभा में सेल्यूकश के राजदूत मेस्थनीज ने भारत में सिंचाई व्यवस्था पर विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि उस समय सम्पूर्ण भारत में वर्ष में अच्छी सिंचाई व्यवस्था थी। विष्णुगुप्त ‘’कौटिल्य’’ ने भी अपने ग्रन्थ अर्थशास्त्र में राजा को सलाह दी है कि शत्रुओं पर विजय पाने के लिए शत्रुराज्य की भूमि को, उनके राज्य की सीमाओं के अन्तर्गत बने बाधों नहरो एवं तटबन्धों को तोड़कर, जलप्लावित कर दो। कौटिल्य ने नहरो एवं बांधों का उल्लेख अन्य संदर्भों में किया है। उनके अर्थशास्त्र में यह उल्लेख मिलता है कि नदियों, झीलों, बॉंधों एवं मशीन चलित कुओं से पानी के उपयोग पर कृषि उत्पादन के चौथाई अंश को राजस्व के रूप राजा को देना होता था। यदि निजी बॉंधों का रखरखाव पॉंच वर्षों तक उपेक्षित रहता था तो राज्य द्वारा उनको अपने अधीन कर लिया जाता था। यदि किसी बॉंध आदि का निर्माण जनता के सहयोग से किया जाता था तो उस स्थिति में 4 वर्ष तक राजस्व कर में छूट दी जाती थी। कौटिल्य के अनुसार राज्य में कृषि केवल वर्षापात पर ही निर्भर नहीं थी। भू-राज्स्व भी वर्षापात की मात्रा के आधार पर लिया जाता था।
4.02 ईसा से 400 वर्ष पूर्व महाराजा नंद द्वारा एक जल सेतु का निर्माण गया था जो कि काफी लम्बे समय तक उपेक्षित रहा। ईसा के 100 वर्ष पूर्व उड़ीसा के महान शासक खारवेल (Kharvela) द्वारा इस जल सेतु को पुन: उपयोग में लाये जाने योग्य बनाया गया।
4.03 दक्षिणी भारत में पहली शताब्दी में चोल शासकों द्वारा बान्धों एवं नहरों का निर्माण कराया गया। ऐया कहा जाता है कि आज से लगभग 1700 वर्ष पूर्व मद्रास के स्थानीय अभियन्ताओं द्वारा तंजौर जिले में शानदार एनीकट (वियर) का निर्माण कराया गया जो कि इस तरह के कार्य की पहली मिसाल थी।
5.0 ब्रिटिश काल के पूर्व:
5.01 देश के विभिन्न भागों में सिंचाई कार्यों के विद्यमान होने का प्रमाण ऐतिहासिक अभिलेखों में प्रचुरता से मिलता है। उत्तरी भारत में सिन्धु एवं गंगा जैसी सदानीरा नदियों के होने कारण उसके पानी को इननडेशन (Inundation) नहरें बनाकर सिंचाई के लिए उपयोग करना अपेक्षाकृत आसान था। भारत की मुख्य इननडेशन नहरें सिन्धु नदी एवं इसकी पाँच सहायक नदियों से निकाली गयी है। सतलज एवं चेनाब नदियों के मध्य स्थित मुल्तान जिले में वर्षा बहुत कम होती थी, परन्तु सतलज एवं चेनाब नदियों से कई इननडेशन कैनाल निकालकर इस भूभाग को काफी उपजाऊ बना दिया गया। ऐसा कहा जाता है कि इन इननडेशन नहरों का निर्माण अफगान शासकों द्वारा कराया गया था। पंजाब प्रान्त में इस प्रकार की इननडेसन कैनाल की कुल लम्बाई 480 कि0मी0 के आसपास थी और उनसे पर्याप्त क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होती थी। सिन्धु प्रान्त में इननडेशन नहरों की लम्बाई लगभग 4160 कि0मी0 थी और इनसे लगभग 6.8 लाख हेक्टेयर फसलों की सिंचाई होती थी। पंजाब एवं सिन्धु प्रान्तों में 19 वीं शताब्दी के अन्त तक इस भूभाग की लगभग 12.0 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई इन इननडेशन नहरों पर निर्भर रहने लगी। इन नहरों का रखरखाव एवं प्रबन्धन सरकार द्वारा किया जाता था।
5.02 उत्तरी भारत में सबसे पहले यमुना के दोनों तटों से नहर निकालने का कार्य किया गया। यमुना के पश्चिमी तट से निकाली गयी नहर का निर्माण फिरोजाशाह द्वारा कराया गया बताया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि 14वीं शताब्दी के मध्य फिरोजशाह ने हिसार के निकट स्थित अपने शिकारगाह की सिंचाई करने हेतु उक्त नहर का निर्माण कराया था। नहर के रखरखाव पर समुचित ध्यान न दिये जाने के कारण यह नहर उपयोग के योग्य नहीं रह गयी, लेकिन 16वीं शताब्दी में अकबर महान द्वारा इन नहरों के पुर्नस्थापना के आदेश दिये गये और उसके द्वारा इस कैनाल की देख रेख हेतु ‘मीर-आब’ उपाधि के अन्तर्गत ‘चीफ आफ वाटर’ की नियुक्ति की गयी थी। ‘मीर-आब’ को अपने कार्य क्षेत्र में पूर्ण अधिकार प्रदान किये गये। तत्पश्चात 17वीं शताब्दी के आरम्भ में शाहजहॉं द्वारा पत्थरों को काटकर एवं जल सेतु का निर्माण कराकर अपने प्रतिभाशाली सहायक अलीमर्दनखॉं की सहायता से इस नहर को शाहजहानाबाद (दिल्ली) तक लाया गया। निर्माण के लगभग 125 वर्ष बाद तक यह दिल्ली नहर दक्षतापूर्वक कार्य करती रही। साम्राज्य के असंगठित हो जाने के कारण फिरोज नहर में 1707 से पानी चलना बन्द हो गया तथा 18वीं शताब्दी के मध्य तक मुगल नहरों का अस्तित्व भी प्राय: समाप्त हो गया। इस प्रकार लगभग 400 वर्ष तक ज्यादा या कम दक्षता से चलने वाली यह नहर प्रणाली अन्तिम रूप से समाप्त हो गयी।
5.03 सन् 1521 में विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय द्वारा कोरांगल के पास तुगंभद्रा नदी पर अब तक की सबसे बड़ी नहर एवं वासाबन्ना नहरों का निर्माण कराया गया। यह नहरें आज भी उनयोग में है। 5.03 5.04 यमुना नदी के बायें तट से निकलने वाली पूर्वी यमुना नहर, जिसे दोआब नहर के रूप से भी जाना जाता है, का श्रेय अलीमर्दनखान को जाता है। इस नहर के शीर्ष का निर्माण शिवालिक पहाडि़यों पर स्थित है तथ्था यह नहर शाहजहॉ के शिकारगाह ‘बादशाह महल’ से हो कर जाती थी। यह नहर चार बड़ी-बड़ी पहाड़ी नदियों को पार करती हुई कलसिंया, जिला सहारनपुर के पास मैदानी क्षेत्र में वाटर शेड पर प्रवेश करती है तथा इस का अन्तिम छोर दिल्ली के पास यमुना नदी पर समाप्त होता है। नहर के शीर्ष पर गम्भीर प्रकृति कठिनाइयों, जिनका निवारण मुगलकाल के अभियन्ताओं द्वारा सम्भव नहीं हो सका, के कारण यह नहर एक सीजन से अधिक अवधि के लिए नहीं चल पायी। 5.04 5.05 वर्ष 1780 में ‘जबीलाखान रोहिला’ द्वारा इस नहर को पुन: चलाया गया और नदी की एक धारा कृष्णा नदी की तली के माध्यम से जिला मुज्जफरनगर में स्थिति स्थान थाना भवन तक लायी गयी। दुबारा खोदने के पश्चात् यह नहर मात्र कुछ महीनों ही चल सकी और नहर के चलाने में जिन कठिनाईयों का अनुभव किया गया था उनका निराकरण सम्भव नहीं हो सका। 6.0 ब्रिटिशकाल में नहर प्रणालियॉं: 6.0 6.01 ब्रिटिश शासनकाल में सिंचाई का विकास पुराने सिंचाई कार्यों को पुर्नजीवित करने, उनमें सुधार एवं विस्तार करने से प्रारम्भ किया गया। वर्ष 1817 में लार्ड हेस्टिंग्ज द्वारा इंजीनियर कोर के लेफटीनेन्ट ‘ब्लेन’ को यमुना के पश्चिमी तट से निकलने वाली दिल्ली शहर की देख रेख हेतु एवं 1822 में उसी कोर के लेफ्टीनेन्ट डिव्यूड को यमुना नदी के पूर्वी तट से निकलने वाली ‘दो आब कैनाल’ की देख रेख हेतु नियुक्त किया गया।
6.02 पश्चिमी यमुना नहर के शीर्ष की स्थापना लेफ्टीनेन्ट ब्लेन द्वारा इस प्रकार की गयी, जिससे बाढ़ की विभिषिका को नियंत्रित करने एवं नहरों में अबाधित पानी चलाने में सहायता मिली। इस नहर को सन् 1821 में चलाया गया मुख्य नहर एवं शाखाओं की लम्बाई 712 कि0मी0 थी। 6.02 6.03 पूर्वी यमुना नहर का सर्वेक्षण लेफ्टीनेंट डिब्यूड द्वारा प्रथम बार 1822 में किया गया। तत्पश्चात इंजीनियर कोर के ही कर्नल रार्बट स्मिथ द्वारा इस नहर प्रणाली के विभिन्न कार्यों को 1830 में पूर्ण किया गया। इस नहर का सामान्य समरेखन वाटरशेड पर था। इन कार्यों के पूर्ण हो जाने के पश्चात् इस नहर को तीन जनवरी 1830 को प्रथमबार चलाया गया। लगभग 2 सप्ताह चलने के बाद दिनांक 20 जनवरी 1830 को यह पाया गया कि सहारनपुर के उत्तर और सुरावली के दक्षिण में नहर पर निर्मित सभी पुल गम्भीर रूप से क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में पहुँच गये है। पक्के कार्यों के क्षतिग्रस्त होने की सम्भावना के साथ-साथ यह भी देखा गया कि नहर के ऊपरी भाग से भारी मात्रा में लाई गयी सिल्ट के कारण, नहर, सिंल्ट से भर गयी। इन समस्याओं के निराकरण हेतु यह कार्य कर्नल पी0टी0 काटले, जो कि कर्नल स्मिथ के सहायक थे, को सौंपा गया। कर्नल काटले द्वारा इस नहर का पुर्नरोद्वार कराया गया तथा आवश्यकतानुसार चिह्नित स्थानों फाल का निर्माण इस प्रकार कराया गया कि नहर की तली का ढाल 17 इंच से 24 इंच प्रतिमील रहा। पुनरोद्वार के पश्चात् वर्ष 1836 में यह नहर पुन: पूर्ण सफलता के साथ चलाई गयी। 6.03 6.04 रमणीक दूनघाटी में भी बीजापुर एवं राजपुर नहरों का निर्माण भी कर्नल काटले द्वारा कराया गया। 6.04 6.05 गंगा यमुना दोआब की उपजाऊ भूमि को सिंचाई सुविधा प्रदान करने हेतु गंगा नदी के पानी को उपयोग करने की दृष्टि से वर्ष 1836 में इस भू-भाग के अघ्ययन की अनुशंसा कर्नल ‘काल्विन’ नहरो के महाअधीक्षक, द्वारा की गयी। वर्ष 1837-38 में उत्तरी भारत में पड़े घोर आकाल ने इस दोआब में सिंचाई सुविधा शीघ्राति शीघ्र उपलब्ध कराने की और ब्रिटिश शासकों का ध्यान आकृष्ट किया। फलत: इस मामले में कर्नल काटले ने अपनी पहली रिपोर्ट 12 मई 1840 को सरकार काके सौंपी, जिस पर विचार करते हुए कोर्ट आफ डायरेक्टर्स द्वारा गंगा यमुना दो आब में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराये जाने हेतु नहर की योजना बनाकर प्रस्तुत करने का निर्णय लिया गया। कोर्ट आफ डायरेक्टर्स के निर्देशानुसार अनुभवी अभियन्ताओं को कर्नल काटले के साथ सम्बद्ध किया गया। इस कमेटी ने फरवरी 1842 में यह संस्तुति की, कि गंगा के पानी का उपयोग करते हुए एक नहर का निर्माण किया जाये जिसकी परिकल्पित क्षमता 6750 क्यूसेक होगी। कर्नल काटले द्वारा नहर का निर्माण जिसे ऊपरी गंगा नहर के नाम जाना जाता है। 1842 में प्रारम्भ किया गया तथा इस नहर को 8 अप्रैल 1854 को चलाया गया। यहॉं यह भी उल्लेखनीय है कि ऊपरी गंगा नहर निर्माण के पूर्व एवं निर्माण काल में विभिन्न समस्याओं का जिस सूक्ष्मता गहनता से अध्ययन किया गया सम्भवत: इस सीमा तक किसी अन्य परियोजना में नहीं किया गया। 6.06 बुन्देलखण्ड प्रदेश का ऐसा क्षेत्र है जहॉं औसत वार्षिक वर्षा मात्र 760 मि0मी0 है। फलत: इस क्षेत्र में सतही जल एवं भूगर्भ जल की सदैव कमी रहती है। अत: पीने के पानी तथा सिंचाई के लिए जल का भण्डारण तालाबों एवं जलाशयों में किया जाता है। 8वीं एवं 12वीं शताब्दी, के मध्य चन्देल शासकों द्वारा इस क्षेत्र में 4000 सरोवरों का निर्माण कराया गया जिनमें से कुछ आज भी मौजूद है। तत्पश्चात ब्रिटिश शासनकाल में इस क्षेत्र में बॉंधों का निर्माण कराकर उनसे सिंचाई के लिए नहरे निकाली गयी। 6.07 वर्ष 1879 में प्रदेश अभूतपूर्व सूखे से प्रभावित हुआ। इस सूखे से बुन्देखण्ड क्षेत्र में पर्याप्त संख्या में जनजीवन की हानि हुई। इस सूखे की विभीषिका से निपटने में प्रदेश के संसाधन उपयुक्त नहीं पाये गये। वर्ष 1880 में सूखा आयोग का गठन इस प्रकार की घटनाओं की पुर्नरावृत्ति न होने देने के लिए तथा साधन एवं उपायों को चिन्हित करने के लिए किया गया। इस आयोग द्वारा यह सबल संस्तुति की गयी कि प्रदेश के 40 प्रतिष्शत कृषित क्षेत्र को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाय। तदानुसार वर्ष 1885 में जनपद जालौन एवं हमीरपुर के क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के प्रयोजन से बेतवा कैनाल का निर्माण पूर्ण कर उसमें पानी चालाना प्रारम्भ किया गया। वर्ष 1903 में द्वितीय सूखा आयोग ने भी कृषित क्षेत्र को पहले आयोग द्वारा संस्तुत सीमा तक सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने की सबल संस्तुति की। इन सुविधाओं को प्रदेश के दक्षिणी भाग में उपलब्ध कराने हेतु पूर्व क्रम में बॉंदा जिले में केन कैनाल वर्ष 1907 में जनपद हमीरपुर में धसान कैनाल वर्ष 1910 में तथा मिर्जापुर जिले में घाघरा एवं गरई नहरों का निर्माण क्रमश: 1913 व 1915 में किया गया।
6.08 द्वितीय सूखा आयोग की संस्तुतियों के अनुसार प्रदेश के मध्य भाग में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु शारदा नहर प्रणाली का निर्माण वर्ष 1919 में प्रारम्भ करके वर्ष 1928 में पूर्ण किया गया।
7.0 ब्रिटिशकाल की मुख्य-मुख्य सिंचाई परियोजनाऍं अ - पूवीं यमुना नहर:
पूर्वीं यमुना नहर, यमुना नदी के बॉये तट से ताजेवाला के निकट से निकलती है। इस नहर प्रणाली द्वारा हिन्डन यमुना दोआब के निम्न जनपदों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध करायी जाती है:- (1) सहारनपुर (2) मुज्जफरनगर (3) मेरठ (4) गाजियाबाद पुनरोद्वार के पश्चात यह नहर प्रथमबार 1830 में चलायी गयी उस समय इस नहर का परिकल्पित डिस्चार्ज 800 क्यूसेक था। शनै:- शनै: इस क्षेत्र में सिंचाई का विकास होता रहा एवं कुछ और नहरों का निर्माण समय-समय पर कराया गया। वर्ष 1955-56 में इस नहर की परिकल्पित क्षमता बढाकर 2500 क्यूसेक की गयी एवं कालान्तर में इसे बढाकर 4000 क्यूसेक किया गया। इस नहर प्रणाली की मुख्य विशिष्टियॉं निम्नवत है:- (1) वर्तमान जल प्रवाह क्षमता 4000 क्यूसेक (2) मुख्य नहर की लम्बाई 197 कि0मी0 (3) रजबाहों एवं अल्पिकाओं की लम्बाई 11380 कि0मी0 (4) कृषि योग्य क्षेत्रफल 2.21 लाख हेक्टेयर (5) प्रस्तावित सींच खरीफ 52 प्रतिशत रबी 38.5 प्रतिशत कुल 90.5 प्रतिशत हेड रेग्यूलेटर का निर्माण त्रुटिपूर्ण होने के कारण पूर्वी यमुना नहर अपनी परिकल्पित क्षमता से चल सकने में सक्षम नहीं है। नहर को उसकी पूर्ण क्षमता से चलाने हेतु यमुना नदी पर एक ‘फोरसिंग’ बॉंध का निर्माण प्रत्येक वर्ष करना पडता है। यह बॉंध प्रत्येक साल जुलाई में टूट जाता है तथा नहर में समुचित पानी चलाने हेतु अक्टूबर में इसका निर्माण पुन: कराया जाता है। वर्ष 1954 में हुए समझौते के अनुसार इसका निर्माण्ा एवं रखरखाव हरियाणा सरकार द्वारा किया जाता है। उक्त कारणों से इस नहर प्रणाली में जुलाई से पानी की कमी होने लगती है एवं अक्टूबर आने तक तो इस नहर में कभी-कभी जल आपूर्ति शून्य भी हो जाती है। इस समस्या के समाधान हेतु ताजे वाला से लगभग 3 कि0मी0 उपर हथिनीकुण्ड बैराज का निर्माण कराया गया है।
ब- ऊपरी गंगा नहर:
ऊपरी गंगा नहर का निर्माण वर्ष 1842 तक की अवधि में कराया गया। इस परियोजना के जनक कर्नल सर पी0टी0 काटले थे। इस नहर में प्रथमबार 8 अप्रैल 1854 को पानी चलाया गया। यह नहर हरिद्वार के भीमगोडा नामक स्थान स्थान से गंगा नदी के दाहिने तट से निकलती है। प्रारम्भ में इस नहर में जलापूर्ति गंगा नदी मे एक अस्थायी बॉंध बनाकर की जाती थी। वर्षाकाल प्रारम्भ होते ही अस्थायी बॉंध टूट जाया करता था तथा मानसून अवधि में नहर में पानी चलाया जाता था। इस प्रकार इस नहर से केवल रबी ही सिंचाई हो पाती थी। वर्ष 1917-1922 की अवधि में अस्थायी बॉंध निर्माण स्थाल के डाउनस्ट्रीम में वर्ष 1978-1984 की अवधि में भीम गोड़ा वियर का निर्माण करवाया गया। इसके बन जाने के बाद ऊपरी गंगा नहर प्रणाली के खरीफ की फसल में भी पानी दिया जाने लगा।
वियर के फाटकों का संचालन काफी जटिल एवं जोखिम भरा होता है, साथ ही वियर के अपस्ट्रीम में सिल्ट जमा होते रहने के कारण नदी की तली का स्तर भी धीरे-धीरे ऊपर उठने लगता है। इन्हीं कारणों से पूर्व निर्मित वियर्स के स्थान पर बैराजों का निर्माण किया जा रहा है । इन्हीं समस्याओं के समाधान हेतु पूर्व निर्मित भीमगोडा वियर के डाउनस्ट्रीम में वर्ष 1978-1984 की अवधि में भीमगोडा बैराज का निर्माण कराया गया। इस नहर प्रणाली द्वारा निम्न जनपदों में सिंचाई सुविधा कराई जा रही है:- (1) हरिद्वार ( 2) सहारनपुर ( 3) मुज्जफरनगर ( 4) मेरठ (5) गाजियाबाद (6) बुलन्दशहर (7) अलीगढ (8) एटा (9) मथुरा (10) फिरोजाबाद (11) मैनपुरी (12) आगरा ऊपरी गंगा नहर से निम्न तीन मुख्य शाखाएं निकलती है: (1) देवबन्द शाखा (2) अनूपशहर शाखा (3) माठ शाखा प्रारम्भ में इस नहर प्रणाली का उपयोग नौ परिवहन हेतु भी किया जाता था जो अब समाप्त हो गया है। सिंचाई के अतिरिक्त इस नहर प्रणाली से 200 क्यूसेक पानी दिल्ली को पीने हेतु तथा 100 क्यूसेक हरदुवागंज तापीय विद्युतगृह को दिया जाता है। मुख्य गंगा नहर पर निर्मित फाल्स(Falls) से जल विद्युत उत्पादन भी किया जा रहा है। इस नहर प्रणाली की मुख्य विशिष्टिया निम्नवत है: (1) मुख्य ऊपरी गंगा की लम्बाई – 298 कि0मी0 (2) नहर प्रणाली की कुल लम्बाई – 6496 कि0मी0 (3) कृषि योग्य समादेश क्षेत्र – 8.85 लाख हेक्टेयर (4) नहर के शीर्ष परपरिकल्पित निस्सार – 10500 क्यूसेक (297.5क्यूमेक) (5) प्रस्तावित सींच: खरीफ – 47 प्रतिशत रबी- 43.9 प्रतिशत कुल- 90.8 प्रतिशत
यह प्रणाली 150 वर्ष से अधिक पुरानी हो चुकी है। अत: इसके आधुनिकिरण के साथ-साथ समुचित रखरखाव की महती आवश्यकता है। गंगा नहर के कि0 मी0 6 से 36 तक निर्मित निम्न संरचनाएं अभियान्त्रिकी कौशल की मिसाल है:- (1) रानीपुर सुपर पैसेज (2) पथरी सुपर पैसेज (3) धनौरी लेविलक्रासिंग जल स्रोत (4) सोलानी जल सेतु यह संरचना 150 वर्षां से अधिक पुरानी हो जाने के कारण अपनी जीवन लीला समाप्त कर चुकी है तथा कभी भी क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में है। इनमें से किसी एक संरचना के ही क्षतिग्रस्त होने से प्रदेश के सुविकसित 8.85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा छिन्न भिन्न हो जायेगी । अत: विश्व बैंक पोषित ऊपरी गंगा नहर आधुनिकीकरण परियोजना के अर्न्तगत कि0मी0 6 से 36 तक समानान्तर नहर में दिनांक 24.11.2001 को पानी चला दिया गया है। उक्त के अतिरिक्त रूड़की के डाउनस्ट्रीम में तथा कि0मी0 1775.5 से 240 तक भी आधुनिकरण के कार्य किये है। ऊपरी गंगा नहर अब तक की सफलतम सिंचाई योजनाओं में से एक है। इस नहर के कारण इसके समादेश क्षेत्र में उल्लेखनीय सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव दृष्टिगोचर होते है।
स- आगरा नहर प्रणाली: हरियाणा के जनपद फरीदाबाद एवं गुड़गॉव, उ0प्र0 के मथुरा एवं आगरा जनपदों तथा राजस्थान के भरतपुर जिले में सुरक्षात्मक सिंचाई पदान करने हेतु यमुना नदी पर ओखला (दिल्ली) के पास एक वियर का निर्माण कर इसके दाहिने तट से आगरा नहर प्रणाली का निर्माण वर्ष 1878 में किया गया था। यह अवधारणा थी कि इस प्रणाली से सितम्बर एवं अक्टूबर के महीनों में पलेवा तत्पश्चात् एक सिंचाई दी जा सकेगी। आगरा नहर का पुनरोद्वार वर्ष 1955-57 के बीच किया गया तथा इका शीर्ष निस्सार 3237 क्यूसेक कर दिसा गया, लेकिन आगरा नहर की शुरू की लगभग 19 कि0मी0 टुकड़ी में कार्य न पूरा हो पाने के कारण यह नहर 2100 क्यूसेक से अधिक पानी लेने में सक्षम नहीं हो सकी।
सिंचाई के लिए पानी की मॉंग बढ़ने के कारण यह आवश्यक समझा गया कि प्रणाली के समादेश में धान की खेती के विकास हेतु यमुना नदी में उनलब्ध जल का उपयोग किया जाय। इन स्थितियों में आगरा नहर के आधुनिकीकरण की योजना बनायी गयी ताकि यह नहर ओखला बैराज से प्रत्यावर्तित 4000 क्यूसेक पानी लेने में सक्षम हो सके। आगरा नहर के आधुनिकीकरण की परियोजना प्रगति में है। इस नहर प्रणाली के मुख्य विशिष्टियां निम्नवत है । (1)आगरा मुख्य नगर की लम्बाई -160 कि0मि0 (2) इससे निकलने वाली फतेहपुरसीकरी जल शाखा की लम्बाई – 93 कि0मि0 (3) प्रणाली की नहरों की कुल लम्बाई – 1874 कि0मि0 (4) कृषि योग्य समादेश क्षेत्र – 3.27 लाख हे0 (5) आगरा नहर के शीर्ष का परिकल्पित निस्सार –4000क्यूसेक (6) आगरा नहर की वर्तमान जल प्रवाह क्षमता –2100 क्यूसेक (7) प्रस्तावित सींच (8) आधुनिकीकरण के पश्चात प्रस्तावित खरीफ 50 प्रतिशत खरीफ 30 प्रतिशत रबी 40 प्रतिशत कुल 70 प्रतिशत द- निचली गंगा नहर: गंगा यमुना दोआब में प्रथमबार सिंचाई सुविधा 19 वी शताब्दी के मध्य काल में ऊपरी गंगा नहर प्रणाली द्धारा उपलब्ध करायी गयी । इस दोआब के निचले भाग में ऊपरी गंगा नहर प्रणाली की बेवर एवं कानपुर जल शाखाओं से सिंचाई सुविधाए उपलब्ध करायी जाती थी। कृषि के विकास के साथ-साथ ऊपरी गंगा नहर प्रणाली के निचले भाग मे पानी की निरंतर कमी रहने लगी अत: पानी की कमी को दूर करने हेतु नरौरा के पास गंगा नदी पर एक वियर बनाकर जिसें बाद में बैराज में परिवर्तित किया गया ,गंगा नदी के दाहिने तट से निचली गंगा नहर की अभिकल्पना 1869 में की गयी । भारतसरकार द्धारा इस योजना की स्वीकृति 9 नवम्बर 1871 को दी गयी। परियोजना के निर्माण कार्य पूर्ण कर निचली गंगा नहर को वर्ष 1878 में प्रथमबार चलाया गया । इस प्रणाली की मुख्य शाखायें निम्नवत है। (1) फरूखाबाद जल शाखा (2) बेवर जल शाखा (3) कानपुर जल शाखा (4) इटावा जल शाखा (5) भोगनीपुर जल शाखा वर्ष 1898 में उ0 प्र0 के जनपद फतेहपुर व इलाहाबाद में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु कानपुर जल शाखा से फतेहपुर जल शाखा का निर्माण कराया गया । उक्त के अतिरिक्त इटावा जल शाखा के अंतिम छोर से भी घटमपुर राजबहा निकालकर जनपद फतेहपुर तक सिंचाई सुविधाणएं बढाई गयी। कालान्तर में रामगंगा बाध के निर्माण के फलस्वरूप वर्ष 1974 में निचली गंगा नहर प्रणाली की जलापूर्ति में वृद्वि की गयी तत्पश्चात समानान्तर निचली गंगा नहर का निर्माण कराकर वर्ष 1984 में ख्क्ष्रीफ की सिंचाई हेतु अतिरिक्त जल उपलब्ध कराया एवं जनपद कानपुर एवं इलाहाबाद के खाकी क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु वर्ष 1974 में पश्विमी इलाहाबाद जल शाखा का निर्माण कराया गया। इस नहर प्रणाली से लाभान्वित होने वाले जनपद निम्नवत है। (1)अलीगढ. (2)एटा (3)फिरोजाबाद (4)मैनपुरी (5)फरूक्ख्खाबाद (6)इटावा (7)कानपुर देहात (8)कानपुर सिटी (9)फतेहपुर (10)इलाहाबाद इस नहर प्रणाली द्वारा गंगा यमुना दोआब के सिंचाई योग्य सम्पूर्ण निचले भाग में सुविधा उपलब्ध करायी जाती है। इस नहर प्रणाली की अन्य विशिष्टिया निम्नवत है (1) कृषि योग्य समादेश क्षेत्र 11.64लाख हेक्टेयर (2) प्रसतावित क्षेत्र खरीफ 41.5 प्रतिशत (3) प्रस्तावित सींच रबी 36.0 प्रतिशत (4) निचली गंगा नहर की लम्बाई 98.8 कि0मी0 (5) समानान्तर निचली गंगा नहर की लम्बाई 89 कि0मी0 (6) निचली गंगा नहर के शीर्ष का परिकल्पित निस्सार 8500 क्यूसेक (7) समानान्तर निचली गंगा के शीर्ष पर परिकल्पित निस्सार 4200क्यूसे़क (8) प्रणाली की कुल लम्बाई 8278 कि0मी0 य-शारदा नहर प्रणाली उत्तर प्रदेश के शारदा/घाघरा-गंगा दोआब में अवस्थित जनपद नैनीताल,पीलीभीत,वरेली, लखीमेपुर खीरी, शाहजहापुर,उन्नाव, लखनऊ बाराबंकी, रायबरेली, प्रतापगढ, फैजाबाद सुल्तानपुर, जौनपुर, आजमगढ, गाजीपुर एवु इलाहाबाद जनपदो में सुरक्षात्मक सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु जनपद नैनीताल की खटीमा तहसील में बनबसा के पास शारदा नदी पर एक बैराज का निर्माण कर इसके दाहिने तट से शारदा मुख्य नहर निकाली गयी। इस परियोजना पर वर्ष 1918 में कार्य प्रारम्भ हुआ एवं वर्ष 1928 में परियोजना पूर्ण कर समादेश क्षेत्र में जल आपूर्ति की जानी प्रारम्भ की गयी। एक अन्तराष्ट्रीय करार के अर्न्तगत बनबसा बैराज के बाये तट पर भी एक रेग्यूलेटर का निर्माण कराया गया, जो कि नेपाल रेग्यूलटर के नाम से जाना है। इस रेग्यूलेटर से नेपाल को रबी में 180 क्यूसेक तथा खरीफ में 250 क्यूसेक पानी दिया जाता है। शारदा मुख्य नहर की लम्बाई 44.3 कि0मी0 है तथा शीर्ष पर इसका परिकल्पित निस्सार 11500 क्यूसेक है। मुख्य नहर के कि0मी0 26.5 दाये तट से बीसलपुर शाखा एवं कि0मी0 38.5 दाये से निगोही जल शाखा निकलती है। इन जल शाखाओं का परिकल्पित निस्सार क्रमश: 350 एवं 500 क्यूसेक है। टेल से शारदा नहर, हरदोई जल शाखा एवं खीरी जल शाखाओं के विभक्त हो जाती है। हरदोई जल शाखा का परिकल्पित निस्सार 5400 क्यूसेक है तथा यह गंगा गोमती दोआब में अव-स्थित क्षेत्र को पोषित करती है। खीरी जल शाखा का निस्सार 2800 क्यूसेक है, इससे गोमती घाघरा दोआब में अवस्थित भू-भाग सिंचित होता है। इस प्रणाली की मुख्य विशिष्टियॉं निम्नवत है: (1) मुख्य नहर की लम्बाई 44.3 कि0मी0 (2) जल शाखाओं की लम्बाई 1634 कि0मी0 (3) राजबाहों एवं अल्पिकाओं की लम्बाई 8283 कि0मी0 (4) कुल 9961.3 कि0मी0 (5) कृषि योग्य समादेश क्षेत्र 16.12 लाख (6) प्रस्तावित सींच खरीफ 25 प्रतिशत (7) प्रस्तावित सींच रबी 24 प्रतिशत यह उल्लेखनीय है कि शारदा सहायक परियोजना के पूर्व इस नहर प्रणाली का कुल कृषि योग्य क्षेत्र 25.4 लाख हेक्टेयर था तथा खरीफ एवं रबी में प्रस्तावित सींच क्रमश: 15.3 प्रतिशत एवं 17.4 प्रतिशत थी। स्वतंत्रता के पश्चात कृषि क्षेत्र में व्यापक विकास हुआ, उन्नतशील, किस्मों के बीजों तथा उर्वरकों का उपयोग प्रचुरता से किया जाने लगा। फलत: इस नहर प्रणाली के अंतिम छोर पर स्थ्ति जनपदों में वास्तविक सींच मात्र 19प्रतिशत तक ही सीमित रह गयी। शारदा नहर प्रणाली के निचले भाग में अवस्थित जनपद लखनऊ, रायबरेली, बाराबंकी, फैजाबाद, अम्बेडकर नगर, सुलतानपुर, प्रतापगढ, इलाहाबाद, भदोही, वाराणसी, जौनपुर, आजमगढ, मऊ, गाजीपुर, एवं बलिया में पानी की कमी की पूर्ति तथा इन जनपदों के खाकी क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराये जाने हेतु घाघरा नदी के जल का उपयोग करते हुए शारदा सहायक परियोजना की परिकल्पना की गयी। इस परियोजना का कृषि योग्य समादेश क्षेत्र 20 लाख हेक्टेयर है तथा खरीफ एवं रबी में प्रस्तावित सिंचाई सघनता कमश: 67 पतिशत एवं 48 प्रतिशत है। परियोजना का विवरण अलग से दिया जा रहा है। र- बुन्देलखण्ड की सिंचाई परियोजनाऍं (i)बेतवा नहर प्रणाली- समय-समय पर पडने वाले सूखे से निपटने के लिए बेतवा नदी पर परीच्छा डैम का निर्माण कर वर्ष 1985 में बेतवा नहर निकाली गयी। इस नहर को सिंचाई के लिए प्रथमबार 1986 में चलाया गया। कृषि के विकास के साथ-साथ सिंचाई की अवश्यकता बढती गयी अंत: बेतवा नहर में जलापूर्ति बढाने हेतु वर्ष 1910 में बेतवा नदी पर ढुकवा बाँध का निर्माण करवाया गया। सिंचाई हेतु पानी की निरन्तर बढती हुई मांग की पूर्ति हेतु एवं जल विद्युत के विकास हेतु ढुकवा बाँध के 16 किमी0 अपस्ट़ीम में माताटीला बाँध बनाने का निर्णय लिया गया। माताटीला बाँध का निर्माण वर्ष 1952 से 1964 की अवधि में कराया गया बाँध के निर्माण के पश्चात बेतवा नहर प्रणाली का कृषि योग्य समादेश क्षेत्र 2.95 लाख हेक्टेयर से बढकर 4.04 लाख हेक्टेयर हो गया। बुन्देलखण्ड एवं मध्य प्रदेश में सिंचाई हेतु पानी की बढती हुई मांग को दृष्टिगत रखते हुए राजघाट बाँध का निर्माण प्रस्तावित किया गया जिसका विवरण अलग से दिया जा रहा है। बेतवा नहर प्रणाली एवं उससे जुडे हुए बांधों का विवरण निम्नवत है: (A) dams: SI.NO. | Featurer | Name of dam | Rajghat | Matatila | Dhukwan | Parichha | (1) | Destrict | Lalitpur(up)guna(mp) | Lalitpur | Jhansi | jhansi | (2) | Tehsil | Lalitpur(up) mugauli(mp) | Talbehat | Jhansi | jhansi | (3) | Nameof river | Bitwa | Bitwa | Bitwa | Bitwa | (4) | Year of constryction | 1976(under caonstruction) | 1952-1964 | 1905-1909 | 1881-1886 | (5) | Full reservoir level | 371.00m | 308.46n | 273.71m | 194.645m | (6) | High flood level | 373.00m | 310.05m | 275.159m | 198.45m | (7) | Sterage | 2171.60mcum | 1019.40mcum | 106.50mcum | 78.76mcum | (8) | Type of dam | Earthen and masonry dame | Earthen masonry dame | Masonry weir | Masonry weir |
(B) canal system: (1) | Name of canal system | Baragron | Betwa | Gursarai | (2) | c.c.a. (th.ha) | 6.00 | 375.28 | 47.08 | (3) | Length of canal system (km) | 45.00 | 2305.14 | 537 | (4) | Designed head discharge (causec) | 75 | 5052 | 537 | (5) | Preposed rabi (th. Ha.) | 2.04 | 147.71 | 16.20 | (6) | Proposed kharif (th. Ha.) | 0.06 | 37.02 | - | (7) | No. of tails (no.) | 6 | 350 | 51 |
वेतवा नहर प्रणाली से उ0 प्र0 के झांसी हमीरपुर एवं जालौन तथा मध्य प्रदेश के दतिया ग्वालियर एवं टीकमगढ जनपद लाभान्वित होते है। (ii) धसान नहर प्रणाली:
घसान नहर प्रणाली को पोषित करने हेतु धसान नदी, जो बेतवा नदी की सहायक नदी है, पर लहचुरा एवं पहाडी बांधों का निर्माण वर्ष 1906 से 1910 की अवधि में कराया गया था। प्रारम्भ में लहचुरा डैम की उपयोगी क्षमता 954.1 लाख धनमीटर तथा पहाडी बाँध की उपयोगी क्षमता 1153.5 लाख धनमीटर थी, जो कि सिल्टिंग के कारण वर्ष 1946 से घटकर ध.मी. अतिरिक्त जल सपरार डैम से उपलब्ध कराया गया। वर्ष 1986 तक इन बांधों की क्षमता और घट गयी। वर्तमान लहचुरा बाँध बहुत पुराना हो गया था अत: इसके एक कि0 मी0 नीचे नवीन लहचुरा डैम का प्रस्ताव किया गया। लहचुरा एवं पहाडी बांधों तथा नवीन लहचुरा बाँध एवं धसान नहर प्रणाली की मुख्य विशेषताएं निम्नवत है:
(A) dams: Featurer | Nam of dam | Pahari | Lahchura | Proposednew lahchura dam | Destrict | Jhansi | Jhansi | Jhansi | Tehsil | Mauranipur | Mauranipur | Mauranipur | Name of construction | 1909-1912 | 1906-1910 | Under construction | Full reservoir level | 195.93 m | 182.27 m | 182.30 m | High flood level | 198.67 m | 185.40 m | 184.70 m | Flood discharge | Cumecs | Cumecs | 18000 cumecs | Live storage | 47.80 mcum | 10.56 mcum | …………… | Type ofdam weir Weir (falling-shutters) | Weir (falling shuters) | Dam (falling shutters) |
Note:- pahari dam is located at u/s of lahchura and feeds. Lahchura dam. (B) canal system: Name of canal system | Dhasan canal system | c.c.a. | 0-978lac hec. | Length of canal system | 631.65 km. | Designed head discharge | 28.90 cynec (1000 cusecs) | Proposed rabi | 0.356 lac hec. | Proposed rabi | Nil | No. of tails | 64 |
लाभान्वित जनपद: हमीरपुर उत्तर प्रदेश (iii) केन नहर प्रणाली केन नहर, मध्य प्रदेश जनपद पन्ना के पास केन नदी के दाहिने तट से, बरियारपुर वीयर का निर्माण कर निकाली गयी। यह कैनाल प्रथमवार वर्ष 1907 में 28.32 क्यूमेक डिस्चार्ज से चलायी गयी। पानी की बढ़ती हुई मांग को देखते हुये बरियारपुर वीयर पर और अधिक पानी उपलब्ध कराने की दृष्टि से बरियारपुर वीयर के अपस्ट्रीम पर गंगऊ बांध का निर्माण वर्ष 1915 में कराया गया। इसके निर्माण के पश्चात भी उस क्षेत्र में निरन्तर पानी की कमी का अनुभव किया जाता रहा। अत: अतिरिक्त जल संचय करने की दृष्टि से बन्ने नदी, जो केन नदी की सहायक नदी है, पर रंगवा बांध का निर्माण वर्ष 1957 में कराया गया। इस जलाशय में 1546.7 लाख घनमीटर अतिरिक्त जल का संचय कर केन नहर प्रणाली को अतिरिक्त जल आपूर्ति सम्भव करायी गयी । केन नहर के समादेश क्षेत्र में पानी की बढ़ती हुई मांग को पूरा करने हेतु केन नहर के पुनरोद्वार की एक योजना 1968 में बनायी गयी, जिसका अनुमोदन योजना आयोग द्वारा वर्ष 1973 में रूपया 48 लाख का किया गया। इस परियोजना के अन्तर्गत केन मुख्य नहर की क्षमता बढ़ाकर 70.80 क्यूमेक करने का प्रस्ताव किया गया। निर्माण सामग्री एवं पराश्रमिक दरों में वृद्वि के कारण इस परियोजना को वर्ष 1990 में पुनरीक्षित किया गया, परियोजना की पुनरीक्षित लागत रूपया 476.20 लाख आंकी गयी। बरियारपुर वियर, गंगऊ वियर एवं रंगवा बांध की क्षमता निम्नवत है: क्र0 बांध का नाम बांध की परिकल्पित क्षमता बांध की वर्तमान क्षमता (लाख घनमीटर में) (लाख घनमीटर में) 1 बरियारपुर वियर 141.9 126.0 2 गंगऊ वियर 998.3 504.2 3 रंगवा बांध 1637.3 1637.3 कुल 2777.5 2267.5
रंगवा बांध का डेड स्टोरेज 90.6 लाख घनमीटर है अत: कुल पानी जिसका उपयोग वर्तमान में किया जा सकता है 2176.9 लाख घनमीटर है। (A) DAMS: Featurer | Name of Dam | Bariarpur | Gangau | Rangawan | District | Panna (MP | Chhatarpur (MP) | Chhatarpur (MP) | | | | Tehsil | Ajaigarh | Bijawar | Rajnagar | Name of River | Ken | Ken | Banney River | Year of Construction | 1903-1906 | 1911-1915 | 1949-1957 | Live Storage | 12.60 M.Cum | 50.42 M.Cum | 154.67 M.Cum | Type of Dam | Masonry weir (falling shutters) | Masonry weir (falling shutters) | Earthern dam |
(B) CANAL SYSTEM Name of Canal System | Ken canal system | C.C.A. | 3,16,247 Hectares | Length of canal system | 1115.00 km. | Designed head discharge | 70.82 cumecs | Proposed Kharif | 66021 Hec | Proposed Rabi. | 32267 Hec. | No. of tails | 175 |
लाभान्वित जनपद: इस परियोजना से मध्य प्रदेश के जनपद पन्ना एवं छतरपुर तथा उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद लाभान्वित होता है। रंगवा बांध के पानी में उ0प्र0 एवं मध्य प्रदेश का प्रतिभाग 36:15 है। 8 स्वतंत्रता पश्चात की योजनाये अ- पश्चिमी गण्डक नहर प्रणाली : उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया एवं गोरखपुर तथा बिहार के जनपद सारन चम्पारन एवं मुजफ़रपुर की कृषि योग्य भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराये जाने के मामले में केन्द्र सरकार एवं दोनों प्रदेश की सरकारों का ध्यान 19वीं शताब्दी से ही आकर्षित होता रहा है। बिहार के चम्पारन जिले में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु पहली परियोजना वर्ष 1871-72 में तैयार की गयी लेकिन कुछ भौतिक कठिनाइयों के कारण इस परियोजना का परित्याग कर देना पडा गण्डक नदी के त्रिवेणी घाट पर बिना शीर्ष का निर्माण किये नहर की स्वीकृति वर्ष 1896-97 में बिहार में पडे महा अकाल के बाद हो सकी एवं इसका निर्माण वर्ष 1910 में पूर्ण किया गया। द्वितीय महायुद्व के पश्चात देश के सामने खाद्यान्न का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। इस स्थिति में उ0प्र0 एवं बिहार के उक्त जनपदों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने की ओर केन्द्र सरकार एवं दोनों राज्य सरकारें और अधिक गंभीर हुई। तत्कालीन खाद्यय एंव कृषि मंत्री डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने वर्ष 1947 में गण्डक नदी के दोनो तटों से सिंचाई हेतु नहरें निकालने की सम्भावनाओं पर विचार करने का आदेश दिया। परिणामस्वरूप वर्ष 1954 में बिहार सरकार द्वारा 31.94 करोड लागत की एक प्रारम्भिक परियोजना भारत सरकार को प्रस्तुत की गयी। वर्ष 1950-1953 की अवधि में लगातार चार वर्षों तक माह सितम्बर एवं अक्टूबर में वर्षा न होने के कारण उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया एवं गोरखपुर में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गयी। इन स्थितियों में गण्डक नदी से प्रस्तावित सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर लेने के लिये केन्द्र/राज्य सरकारों को बाध्य होना पडा। परिणामस्वरूप भैंसा लोटन से लगभग 14 किमी अप स्ट्रीम में गण्डक नदी पर स्थित पथरहवा घाट से नारायनी नहर प्रणाली निकालने का कार्य तत्काल शुरू किया गया तथा बिना शीर्ष कार्य के 203 किमी लम्बी नहर प्रणाली का निर्माण कार्य वर्ष 1956 में पूर्ण किया गया । इस नहर प्रणाली का कृषि योग्य समादेश क्षेत्र 0.54 लाख हेक्टेयर था। बिहार सरकार द्वारा 1954 में प्रेषित परियोजना में दोनों राज्य सरकारों की भागीदारी तय करने और सिंचाई के मसग्र विकास हेतु समन्वित योजना तैयार करने के उदे्श्य से भारत सरकार द्वारा केन्द्रीय जल एवं विद्युत आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डा0 ए0एन0 खोसला की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया समिति की कुछ बैठकों के उपरान्त डा0 खोसला के स्थान पर केन्द्रीय जल एवं विद्युत आयोग के ही डा0 के0एल0राव को समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया दिनांक 5 मार्च 1956 को हुई समिति की बैठक में यह सहमति हुई कि नेपाल स्थित भैंसा लोटन के पास गण्डक नदी पर एक बैराज का निर्माण किया जाये। बैराज तथा पश्चिमी गण्डक नहर के निर्माण पर होने वाले व्यय के एक अंश का वहन उ0 प्र0 सरकार द्वारा उक्त बैठक में हुई सहमति के अनुसार किया जायेगा। इस परियोजना के कुछ कार्य नेपाल मे भी पडते थे, अत: नेपाल सीमा में पडने वाले कार्यों को सम्पादित कराने की अनुमति प्राप्त करने हेतु कई बैठकों के उपरान्त भारतीय अभियन्ताओं का एक दल श्री कंवर सेन तत्कालीन अध्यक्ष केन्द्रीय जल एवं विद्युत आयोग, के नेतृत्व में नेपाल भेजा गया। कालान्तर में बिहार तथा उत्तर प्रदेश के मुख्य अभियन्ताओं की एक बैठक दिनांक 12 नवंबर 1958 को लखनऊ में हुई। बैठक में हुई सहमति के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के अनुसंधान एवं नियोजन मण्डल लखनऊ द्वारा अगस्त 1959 में एक प्रारंभिक परियोजना बनायी गयी। कुछ समय बाद परियोजना के पुर्नावलोकन पर यह पाया गया कि पूर्व में तय की गयी शर्तों मे मूलभूत संशोधनों की आवश्यकता है। वर्तमान में परियोजना का स्वरूप निम्नवत है: बिहार नेपाल सीमा पर अवस्थित वाल्मीकि नगर के पास गण्डक नदी पर एक बैराज बनाकर इसके दाहिने तट से मुख्य पश्चिमी गण्डक नहर निकाली गयी। मुख्य नहर के शीर्ष से किमी 18.90 तक का भाग नेपाल में तथा किमी0 18.9 किमी0 131.40 तक का भाग उत्तर प्रदेश में पडता है। इस बिन्दु के नीचे का भाग बिहार में पडता है, जहां इसे सारन नहर के नाम से जाना जाता है इस नहर द्वारा रोहिन राप्ती एवं गण्डक दोआब के अधिकांश भाग में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होती है। मुख्य पश्चिमी गण्डक नहर के शीर्ष का निस्सार 15,800 क्यूसेक है। इसमें से उ0प्र0 का प्रतिभाग 7,300 क्यूसेक है तथा शेष 8,500 क्यूसेक का उपयोग बिहार द्वारा किया जाना प्रस्तावित है । वर्तमान पुनरीक्षित परियोजना प्राक्कलन के अनुसार परियोजना की कुल लागत 154.38 करोड है। पुनरीक्षित परियोजना के अनुसार परियोजना की विशिष्टयां निम्नवत है: 1. स्रोत गण्डक नदी 2. शीर्ष की स्थिति वाल्मीकि नगर नेपाल 3. बैराज की लम्बाई 743 मीटर 4. मुख्य नगर का शीर्ष निस्सार 447.3 क्यूमेक (15800 क्यूसेक) 5. जलशाखाओं की संख्या 06 6. वितरण प्रणाली की कुल लंबाई 3256 किमी 7. लाभान्वित जनपद गोरखपुर, देवरिया, महराजगंज, एवं पडरौना 8. कृषि योग्य समादेश क्षेत्र 3.95 लाख हेक्टेयर 9. प्रस्तावित सींच (i) धान 1.78 लाख हेक्टेयर (ii) गन्ना 0.65 लाख हेक्टेयर (iii) रबी की फसलें 0.89 लाख हेक्टेयर (ब) शारदा सहायक परियोजना प्रदेश के मध्यवर्ती एवं पूर्वी जनपदों के घाघरा – गंगा दोआब के 20 लाख भू-भाग में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु घाघरानदी के पानी का उपयोग कर वर्ष 1968-69 में शारदा सहायक परियोजना प्रारम्भ की गयी। इस परियोजना से प्रथमबार वर्ष 1974 में पानी देना प्रारम्भ किया गया परियोजना का विस्तृत विवरण अलग से दिया जा रहा है। (स) मध्य गंगा परियोजना (प्रथम चरण) वर्षाकाल में गंगा नदी में पर्याप्त जल की मात्रा उपलब्ध रहती है, परन्तु ऊपरी गंगा नहर और सोलानी जल सेतु की क्षमता सीमित होने के कारण इस जल का उपयोग नही हो पा रहा है । इस उददेश्य से बिजनौर से 10 किमी0 प्रवाहोत्तर गंगा नदी पर एक बैराज निर्मित कर नदी के दोनो ओर नहरों का निर्माण प्रस्तावित है प्रथम चरण की परियोजना में नदी के दाये तट से 115.45 किमी0 लम्बी 8280 क्यूसेक क्षमता की एक मुख्य नहर निकाली गयी है, जो ऊपरी गंगा नहर के किमी0 190.80 पर मिलती है । बीच में किमी0 77.085 पर यह ऊपरी गंगा नहर की अनूपशहर शाखा को काटती है जिसे यह 900 क्यूसेक्स पानी देगी। मध्य गंगा नहर के किमी0 82.428 से 2225 क्यूसेक क्षमता की लखावटी शाखा का निर्माण कराया गया है, इसकी वितरण प्रणाली की लंबाई 963.2 शाखा किमी0 है। ऊपरी गंगा नहर के किमी0 178.6 से 239.20 तक 4500 क्यूसेक जल का उपयोग प्रस्तावित है। ऊपरी गंगा नहर के किमी0 239.20 से 2750 क्यूसेक्स शीर्ष क्षमता की 47.70 किमी0 लम्बी मांट पोषक नहर का निर्माण पूर्ण हो गया है, जो ऊपरी गंगा नहर की मांट शाखा में उकसी हाथरस शाख के शीर्ष से तुरन्त ऊपरी मिलेगी। मांट पोषक नहर से 306 किमी0 लम्बी नहर का निर्माण किया गया है। परियोजना की विशिष्टयां निम्नवत हैं: (1) बैराज (क) स्थिति बिजनौर शहर से 10 किमी0 पश्चिम की ओर गंगा नदी पर रावली घाट से 9 किमी0 प्रवाहोत्तर (ख) परिकल्पित का डिस्चार्ज 17000 घनमीटर प्रति सेकेंड (ग) जलमग्न क्षेत्र 5766 हेक्टेयर (2) मुख्य नहरें (क) शीर्ष डिस्चार्ज 234 घनमीटर प्रति सेंकेंड (ख) लम्बाई 115.45 किमी0 (3) वितरण प्रणाली लखावटी नहर (क) शीर्ष डिस्चार्ज 63 घनमीटर (ख) मुख्य नहर की लंबाई 62.4 किमी0 (ग) वितरण शाखा की लंबाई 600.38 किमी0 (घ) कृषि योग्य क्षेत्र 30192 हेक्टेयर मध्य गंगा नहर की सम्पूर्ण परियोजन हेतु (क) योजना की प्रस्तावित लागत रू0 44819.00 (ख) कुल प्रस्तावित सिंचन क्षेत्र (i) ऊपरी गंगा नहर प्रणाली के 114 हजार हेक्टेयर कमांड का अतिरिक्त क्षेत्र (ii) नई नहर द्वारा 64 हजार हेक्टेयर द- पूर्वी गंगा नहर परियोजना बिजनौर एवं मुरादाबाद जनपद के 233 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में से 105 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में धान, की सिंचाई हेतु पूर्वी गंगा नहर परियोजना प्रस्तावित की गयी। इसके अन्तर्गत हरिद्वार के समीप नव – निर्मित भामगोडा बैराज के बांये किनारे से 4650 क्यूसेक (137.40 क्यूमेक्स) क्षमता की 48.55 किमी0 लंबी मुख्य नहर प्रस्तावित की गयी हैं। इसकी पांच शाखायें क्रमश: चन्दक, नजीबाबाद, नगीना नहटोर एवं अलावलपुर जिनकी कुल लंबाई 155.17 किमी0 तथा इसके निकलने वाली वितरण प्रणालियों की कुल लंबाई 1489 किमी0 का निर्माण काय्र प्रस्तावित है इसके फलस्वरूप इन शाखाओं से गंगा नदी के वर्ष ऋतु में उपलब्ध अतिरिक्त जल का उपयोग हो सकेगा। भूमि दरों में अप्रत्याशित वृद्वि के कारण शासन स्तर से परियोजना के नये कार्यो को कराने पर वर्ष 1996-97 के 8/96 माह में उन प्रकरणों के संबंध में शिथिल किया गया, जिसमें भूमि अध्याप्ति की धारा-6 हो चुकी है। शासन द्वारा सीमित रूप से नये कार्यों पर प्रतिबंध हटाये जाने के बाद 3/2000 तक मुख्य नहर एवं शाखायें 3.9 किमी0 व वितरण प्रणाली लगभग 95.5 किमी0 की लंबाई के कार्य पूर्ण किये जायेंगे जिनसे लगभग 15.338 हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचन क्षमता का स्रजन हो सकेगा। जून 1999 तक 32.714 हेक्टेयर सिंचन क्षमता स्रजित हो गयी है। उपरोक्तानुसार धारा -6 के बाद ली गयी भूमि पर कार्य पूर्ण होने के बाद जून, 2000 तक कुल स्रजित सिंचन क्षमता 40.106 हेक्टेयर हो जायेगी। खरीफ 1407 फसली में मुख्य नहर एवं इसकी चन्दक नहटोर, अलावलपुर तथा जनीबाबाद शाखाओं व इनकी निर्मित विवरण प्रणालियों को सिंचाई के लिये चलाया गया तथा 12276 हेक्टेयर सींच हो गयी। परियोजना की विशिष्टया निम्नवत है :- 1) स्रोत गंगा नदी 2) शीर्ष की स्थिति हरिद्वार में नवनिर्मित भीमगोंडा बैराज के बांये तट पर 3) नहर का कमांड जनपद बिजनौर एवं मुरादाबाद में गंगा नदी, रामगंगा पोषक नहर एवं खो नदी के बीच का क्षेत्र 4) मुख्य नहर का जल निकास 137.40 घनमीटर प्रति सेकेण्ड (4850घनफुट प्रति सेकेंड) 5) मुख्य नहर की लंबाई 48.55 किमी0 6) सिंचन प्रणाली (क) शाखायें 155.17 किमी0 (ख) राजबाहे एवं अल्पिकायें 1489.00 किमी0 (ग) अ- नाले 400.00 किमी0 ब- गूलें 4450.00 किमी0 (घ) गूल कमाण्ड 301.00 हजार हेक्टेयर (ड) कृषि योग्य भूमि 233.00 हजार हेक्टेयर 7 प्रस्तावित धान की सिंचाई का क्षेत्र 105.00 हजार हेक्टेयर 8 अनुमानित लागत (क) स्वीकृति 48.46 लाख रूपये (ख) संभावित लागत पुनरीक्षित अप्रैल 1996 57766.00 लाख रूपये 9 लागत प्रति हेक्टेयर 55132.38 रूपये 10 अतिरिक्त खादान की उपलब्धि 36.75 लाख कुन्तल धान 9. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात प्रारम्भ की गयी चालू परियोजनायें : अ- राजघाट नहर परियोजना : बुन्देलखंड क्षेत्र के समुचित विकास में सिंचाई योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका के अन्तर्गत बेतवा नदी में उपलब्ध अतिरिक्त जल के उपयोग हेतु राजघाट बांध योजना प्रस्तावित की गयी। इससे सिंचित क्षेत्र में वृद्वि के साथ- साथ पूर्व सिंचित क्षेत्र में अतिरिक्त जल उपलब्ध कराया जाना संभव हो सकेगा। इस परियोजना से उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश दोनो लाभान्वित होंगें। परियोजना से उपलब्ध लाभ व इस पर होने वाले व्यय का बराबर-बराबर बंटवारा दोनों राज्यों में किया गया है। बांध का निर्माण भारत सरकार द्वारा गठित बेतवा नदी परिषद द्वारा सम्पादित हो रहा है। नहर प्रणालियों का निर्माण सम्बन्धित राज्यों द्वारा किया जा रहा है। यह योजना जल आयोग भारत सरकार द्वारा अनुमोदित है। परियोजना की मुख्य विशिष्टयां: 1. स्रोत ललितपुर जनपद में बेतवा नदी पर राजघाट जलाशय। 2. स्थिति राजघाट ग्राम के पास जिला ललितपुर में । 3. शीर्ष पारीच्छा बांध बेतवा मुख्य नहर बेतवा मुख्य नहर का किमी0 30.9 के किमी0 30 4. प्रणाली बेतवा मुख्य हमीरपुर शाखा कुठोंद शाखा योग 4. नहर गुरसरांय एवं 4. बडागांव 4. 5. मुख्य नहर की लम्बाई 30.9 किमी0 132.40 किमी 105 किमी0 6. परिकल्पित डिस्चार्ज 165.89 क्यूमेक्स 57.97 क्यूमेक्स 51 क्यूमेक्स 7. वितरण प्रणाली की लंबाई 116.30 किमी0 258.90 किमी0 225.62 किमी0 8. कुल पानी का उपयोग 3.48 टीएमसी 3.22 टीएमसी 3.072 टीएमसी 9.722 टीएमसी 9. कृषि योग्य क्षेत्र 60207 हे0 55696 हे0 53020हे0 168923 हे0 10. प्रस्तावित सींच 24298 हे0 21595 हे0 20571 हे0 66464 हे0 10.अ रबी 23702 हे0 21595 हे0 20571 हे0 65868 हे0 ब खरीफ 596 हे - - 596 हे0 11. 1990 दर अनुसूची पर 940.71 लाख रू0 870 लाख रू0 700 लाख रू0 251071 ला0रू0 प्रस्तावित पुनरीक्षित परियोजना के अर्न्तगत कार्यों की लागत 12. 1998 दर अनुसूची 1674 लाख रू0 2256 लाख रू0 2120 लाख रू0 6054ला0रू0 12.पर प्रस्तावित 12.पुनरीक्षित परियोजना 12.के कार्यों की लागत 12. इस परियोजना को नवम पंचवर्षीय योजना के अन्तिम वर्ष 2001-2002 में पूर्ण किया जाना प्रस्तावित है। ब- सरयू नहर परियोजना (बांया तटीय घाघरा नहर) बहराइच, गोंडा, बलरामपुर, श्रावस्ती, सिद्वार्थनगर, संतकबीरनगर, बस्ती, एवं गोरखपुर जनपदों के क्षेत्र में सिंचाई साधनों का नितान्त अभाव होने के कारण उस खेत्र के 12 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु रू02765 करोड लागत की सरयू नहर परियोजना निर्माणाधीन है। इसके अन्तर्गत घाघरा नदी के बांय तट से 360 घ0मी0 प्रति सेकेंड क्षमता की 47.135 किमी0 लम्बी एक योजक नहर निकाली गयी है, जो घाघरा नदी के पानी को सरयू नदी में लायेगी । सरयू तथा राप्ती नदियों पर एक एक बैराज बनाया गया है। वहां से निकाली नई नहरें उक्त जनपदों में सिंचन सुविधा उपलब्ध् करायेगी। इन परियोजना के अन्तर्गत अयोध्या पम्प नहर गोला पम्प नहर, उतरौल्ी पम्प नहर, डुमरिया गंज पम्प नहर 3600 नये नलकूपों व 9250 किमी0 नालों का निर्माण एवं साढे चार करोड वृक्ष लगाने का प्राविधान है, जिससे भू-स्तरीय तथा भूमिगत लों का सदुपयोग हो सके तथा जल भराव की आशंका न रहे। इस परियोजना पर कुल 12.00 लाख हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य है। 117 प्रतिशत सिंचाई सघनता पर लगभग 9.00 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई खरीफ में तथा 4.8 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई रबी में प्रस्तावित है। इसके अतिरक्ति 24000 हेक्टेयर भूमि में गन्ना उत्पादन को भी प्रश्रय मिलेगा। परियोजना की मुख्य विशिष्टयां निम्नवत हैं : 1. स्रोत - घाघरा, सरयु, एवं राप्ती नदी 2. जलाशय क्षेत्र क घाघरा नदी 455550 वर्ग किमी0 ख सरयू नदी 4500 वर्ग किमी ग राप्ती नदी 6000 वर्ग किमी 3. बैराज विवरण क सरयू बैराज 1 लंबाई 243.50 मीटर 2 अधिकतम बाढ डिस्चार्ज 4600.00 क्यूमेक 3 फाटक 18 मीटर के 12 दर ख राप्ती बैराज 1 लंबाई 294.5 मीटर 2 अधिकतम बाढ डिस्चार्ज 6117 क्यूमेक 3 फाटक 18 मीटर के 14 दर 3 4 नहरों की लंबाई 1. पोषक मुख्य नहर 257.285 किमी0 2. शाखायें 680.00 किमी0 3 राजबाहे एवं अल्पिकायें 8266.00 किमी0 5. प्रस्तावित वार्षिक सिंचाई- 1 कृषि योग्य क्षेत्र 12.00 लाख हेक्टेयर 2 सिंचन क्षमता खरीफ 75% 9.00 लाख हेक्टेयर रबी 40% 4.80 लाख हेक्टेयर ईंख 2% 0.24 लाख हेक्टेयर कुल 117% 14.04 लाख हेक्टेयर परियोजना की लागत ( करोड रू0 में) I. मूल परियोजना की लागत 299.20 II. 1985 में पुनरीक्षित परियोजना की लागत 696.0 III. 1993 में पुनरीक्षित परियोजना की लागत 1256.0 IV. 1998 में पुनरीक्षित परियोजना की लागत 2765.0 V. 1998 में पुनरीक्षित परियोजना में (कार्य अंश) की लागत 2307.00 VI. वर्ष 2001 के मूल्यों पर कार्य अंश की लागत 2907.0 VII. मार्च 2002 तक परियोजना कार्यों पर सम्भावित व्यय 872.00 VIII. दशम पंचवर्षीय योजना के प्रारंभ (अप्रैल 2002) में 2035.00 VIII.अवशेष कार्यों की लागत दशम पंचवर्षीय योजना के अन्त तक (वर्ष 2007) में इस परियोजना को पूर्ण किया जाना प्रस्तावित है। इस अवधि में परियोजना को पूर्ण करने हेतु कार्यों पर प्रत्येक वर्ष रू0 365 करोड व्यय करना होगा। स- बाण सागर परियोजना, उत्तर प्रदेश : सितम्बर 1973 को मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश , एवं बिहार राज्यों के बीच सोन नदी के पानी के बटवारे का अनुबंध हुआ था। इसके अन्तर्गत सोन नदी के कुल 14.25 मि0 ए0 फीट पानी में से उत्तर प्रदेश का भाग 1.25 मि0ए0 फीट निर्धारित किया गया। इस मात्रा में 1.00 मि0ए0 फीट पानी सोन नदी से तथा 0.25 मि0ए0 फीटकनहर नदी से प्राप्त होगा। सोन नदी के 1.00 मि0ए0 फीट में 0.22 मि0ए0 फीट सोन पम्प नहर द्वारा सोन नदी से उठाकर उपयोग करने का प्राविधान है। एवं 0.78 मि0ए0 फीट पानी बाण्ा सागर बांध से जो कि तीन राज्यो के सहयोग से सोन नदी पर शहडोल (मध्य प्रदेश) में बनाया जा रहा है, लेने का प्राविधान है। बाण सागर बांध के जलाशय से पानी 22 किमी0 लम्बी तथा 185 क्यूमेक्स क्षमता की संयुक्त जल वाहिनी के माध्यम से जिसका निर्माण व्यय उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश दोनों राज्य वहन कर रहे है, लाया जा रहा है। संयुक्त जल वाहिनी से 73 क्यूमेक्स क्षमता की कामन वाटर फीडर मध्य प्रदेश द्वारा बनायी जा रही है जिसके 15.24 किमी0 (टेल) से उत्तर प्रदेश को पानी देने के लिये 46.5 क्यूमेक्स क्षमता तथा 73.1 किमी0 लंबाई बाण सागर फीडर नहर का निर्माण उ0प्र0 द्वारा किया जा रहा है। संयुक्त जल वाहिनी की तरह कामन वाटर फीडर का भी निर्माण व्यय मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश दोनो राज्य वहन कर रहे है। बाण सागर फीडर नहर की पूरी लम्बाई मध्य प्रदेश में पडती है तथा इसका निर्माण उत्तर प्रदेश द्वारा किया जा रहा है। इस नहर के अंतिम भाग में 2.10 किमी0 लम्बी सुरंग होगी जिससे होकर पानी कैमूर पहाडी के उत्तर आदि नाला में गिरेगी। नहर का पानी आदि नाला से होकर अंदवा नदी में जायेगा। अदवा नदी पर वियर बनाकर अथवा मेजा लिंक नहर, जिसकी लंबाई लगभग 25.3 किमी0 होगी, के माध्यम से पानी मेजा जलाशय में लाया जायेगा जहां से इलाहाबाद तथा मिर्जापुर जनपदों में इसका उपयोग होगा। बेलन नदी पर बने मेजा बांध से तथा मेजा बाध एवं बरोधा वियर के मध्य कैचमेंट से प्राप्त पानी के उपयोग का प्राविधान परियोजना में है, जिसके लिये वर्तमान बरौधा वियर को ऊंचा किया जायेगा। इस परियोजना से उत्तर प्रदेश में 150132 हे0 अतिरिक्त सींच प्रस्तावित हैं। यह अतिरिक्त सींच इलाहाबाद में 74823 हे0 एवं जनपद मिर्जापुर में 75400 हे0 होगी। योजना से संबंधित विवरण निम्नवत है: (1) स्थिति (क) ग्राम देवलाद (मध्य प्रदेश) (ख) तहसील शहडोल (मध्य प्रदेश) (ग) जनपद शहडोल (मध्य प्रदेश) (2) नदी का नाम सोन नदी (3) डूब क्षेत्र (बाणसागर बाध) 56428 हे0 (4) औसत वर्षा 1000 मि0मी0 (5) एफ0आर0एल0पर बांध की कुल क्षमता 5.17 मि0ए0फीट (6) नहरों की लम्बाई (क) बाण सागर पोषक नहर 73.10 किमी0 (ख) अदवा- मेजा सम्पर्क नहर 25.30 किमी0 (ग) मेजा - जिरगों सम्पर्क नहर 75.15 किमी0 (घ) जिरगों – हुसैनपुर सम्पर्क नहर 13.20 किमी0 (ड) बेलन नहर का पुनरूद्वार 14.00 किमी0 (7) कृषि योग्य कमाण्ड क्षेत्रफल
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